तो वह वापस माँगने आएगी

 कस्बा था छोटा-सा, नाम था कालापानी। हिमाचल की पहाड़ियों में बसा, जहाँ सर्दियों में कोहरा इतना घना होता कि सामने का आदमी भी धुंधला दिखाई देता। कालापानी की सड़कें संकरी थीं, और रात को बस्ती में सन्नाटा ऐसा छा जाता कि कुत्तों की भौंक तक सुनाई देना बंद हो जाता। गाँव वाले बताते थे कि यहाँ की रातें कुछ अजीब हैं। कुछ कहते, पुरानी हवेली में भूतों का बसेरा है। कुछ का मानना था कि जंगल के उस पार कोई अनहोनी ताकत रहती है, जो रात को जागती है। लेकिन ये सब बातें थीं, जो दिन के उजाले में हँसी-मजाक बनकर रह जाती थीं। रात होते ही लोग अपने घरों में ताले डालकर दुबक जाते।

कमलेश एक नया-नया पत्रकार था। दिल्ली से आया था, छोटे-मोटे अखबार में काम करता था। उसे कालापानी भेजा गया था एक स्टोरी के लिए। कस्बे के पास जंगल में कुछ पुरानी खदानों के अवशेष मिले थे, और वहाँ से कुछ अजीबोगरीब चीजें निकल रही थीं—कंकाल, पुराने हथियार, और कुछ ऐसी चीजें जिनका कोई हिसाब नहीं था। कमलेश को ये स्टोरी बोरिंग लग रही थी, लेकिन नौकरी नई थी, और उसे कुछ बड़ा करना था। उसने सोचा, अगर कुछ सनसनीखेज मिल गया तो शायद उसका नाम बन जाए।

वह कालापानी दोपहर के वक्त पहुँचा। बस स्टैंड पर उतरते ही ठंडी हवा ने उसका स्वागत किया। कोहरा हल्का था, लेकिन हवा में कुछ भारीपन था। उसने अपना बैग कंधे पर डाला और गाँव की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे एक चाय की दुकान दिखी, जहाँ कुछ बुजुर्ग बैठे पाइप पी रहे थे। कमलेश ने चाय माँगी और बात शुरू की।

“खदान की स्टोरी के लिए आया हूँ,” उसने कहा, “क्या सचमुच वहाँ कुछ अजीब है?”

बुजुर्गों ने एक-दूसरे को देखा। एक ने पाइप से धुआँ छोड़ते हुए कहा, “बेटा, खदान में कुछ भी हो, रात को वहाँ मत जाना। दिन में जो करना हो कर लेना।”

“क्यों?” कमलेश ने हँसते हुए पूछा। “भूत-वूत निकलते हैं क्या?”

“हँस ले बेटा, लेकिन रात का सन्नाटा कुछ अच्छा नहीं लाता,” दूसरे बुजुर्ग ने कहा। उसकी आवाज में कुछ ऐसा था कि कमलेश की हँसी रुक गई।

उसने चाय खत्म की और गेस्ट हाउस की ओर चल दिया। गेस्ट हाउस पुराना था, लकड़ी का बना, जिसके फर्श हर कदम पर चरमराते थे। वहाँ का मालिक, रामलाल, एक मोटा-ताजा आदमी था, जो हर वक्त हँसता रहता था। उसने कमलेश को कमरा दिखाया और कहा, “रात को खिड़की बंद रखना, ठंड बहुत पड़ती है।”

कमलेश ने हल्के से सिर हिलाया और अपने कमरे में सामान रख दिया। उसने खदान के बारे में कुछ नोट्स बनाए और सोचा कि अगली सुबह वह खदान देखने जाएगा। लेकिन उस रात कुछ ऐसा हुआ, जिसने उसकी जिंदगी बदल दी।

रात के करीब ग्यारह बजे होंगे। कमलेश अपने कमरे में लैपटॉप पर कुछ पुरानी खबरें पढ़ रहा था। बाहर सन्नाटा था, बस हवा की सनसनाहट सुनाई दे रही थी। तभी उसे लगा कि कोई खिड़की पर दस्तक दे रहा है। पहले तो उसने सोचा कि शायद हवा से कोई पेड़ की टहनी टकरा रही होगी। लेकिन दस्तक दोबारा हुई—धीमी, लेकिन साफ। टक... टक... टक।

उसने खिड़की की ओर देखा। कोहरे की वजह से बाहर कुछ दिख नहीं रहा था। उसका दिल थोड़ा तेज़ धड़का, लेकिन उसने खुद को समझाया कि यह सिर्फ हवा होगी। उसने खिड़की खोली, और ठंडी हवा का एक झोंका उसके चेहरे पर लगा। बाहर सिर्फ कोहरा था, और कुछ नहीं। उसने खिड़की बंद की और वापस लैपटॉप पर बैठ गया।

लेकिन फिर वही आवाज आई। टक... टक... टक। इस बार तेज़। कमलेश का गला सूख गया। उसने खिड़की की ओर देखा, लेकिन हिम्मत नहीं हुई खोलने की। उसने सोचा कि शायद कोई जानवर होगा। उसने अपने फोन की टॉर्च जलाई और खिड़की के पास गया। शीशे पर कुछ धुंधला-सा निशान था, जैसे किसी ने उंगलियों से कुछ लिखने की कोशिश की हो। लेकिन कोहरे की वजह से कुछ साफ नहीं दिख रहा था।

उसने खुद को डांटा, “कमलेश, तू पत्रकार है, डरने की क्या बात? ये सब बकवास है।” उसने खिड़की खोली और टॉर्च की रोशनी बाहर डाली। कोहरा इतना घना था कि रोशनी कुछ फीट से ज्यादा नहीं जा पाई। लेकिन तभी, कोहरे के बीच उसे कुछ दिखा। एक आकृति। धुंधली, लेकिन साफ तौर पर इंसानी। वह पलक झपकते ही गायब हो गई।

कमलेश ने खिड़की जोर से बंद की और दरवाजे की ओर भागा। उसने चटकनी चेक की—वह बंद थी। उसका दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि उसे अपनी सांस की आवाज सुनाई दे रही थी। उसने सोचा कि शायद उसका दिमाग थक गया है, और वह भ्रम देख रहा है। उसने पानी पिया और बिस्तर पर लेट गया, लेकिन नींद नहीं आई।

सुबह होने तक वह जागता रहा। जब सूरज की पहली किरण कमरे में आई, तो उसे थोड़ा सुकून मिला। उसने सोचा कि रात का डर सिर्फ उसका वहम था। वह गेस्ट हाउस से निकला और खदान की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसे कुछ गाँव वाले मिले, जो उसे देखकर रुक गए। एक औरत ने पूछा, “रात को कुछ सुना?”

कमलेश ने हँसते हुए कहा, “नहीं, बस हवा थी।”

औरत ने उसकी ओर देखा, जैसे कुछ कहना चाहती हो, लेकिन चुप रही।

खदान कस्बे से कुछ किलोमीटर दूर थी। जंगल के बीच एक उजाड़ जगह, जहाँ पुरानी मशीनें और टूटी-फूटी दीवारें थीं। कमलेश ने वहाँ कुछ तस्वीरें लीं और कुछ नोट्स बनाए। खदान के पास एक पुराना बोर्ड था, जिस पर लिखा था: “खतरा! प्रवेश निषेध।” लेकिन बोर्ड इतना पुराना था कि अक्षर धुंधले हो चुके थे।

वहाँ एक बूढ़ा चौकीदार मिला, जिसका नाम था भगत सिंह। उसने कमलेश को देखकर कहा, “यहाँ ज्यादा देर मत रुकना। ये जगह अच्छी नहीं है।”

“क्यों?” कमलेश ने पूछा।

“क्योंकि जो यहाँ रात को रुकता है, वो सुबह नहीं देखता,” भगत सिंह ने कहा और अपनी झोपड़ी की ओर चला गया।

कमलेश को ये बातें अब बकवास लग रही थीं। उसने खदान के अंदर जाने का फैसला किया। अंदर अंधेरा था, और हवा में सड़ांध की गंध थी। उसने टॉर्च जलाई और आगे बढ़ा। खदान की दीवारों पर कुछ निशान थे, जैसे किसी ने खुरचकर कुछ लिखा हो। लेकिन वे इतने पुराने थे कि कुछ समझ नहीं आ रहा था।

तभी उसे एक गैलरी दिखी, जो नीचे की ओर जा रही थी। उसने सोचा कि शायद वहाँ कुछ मिले। वह नीचे उतरने लगा। सीढ़ियाँ पुरानी थीं, और हर कदम पर धूल उड़ रही थी। नीचे पहुँचते ही उसे एक बड़ा सा कमरा दिखा, जिसके बीच में एक पुराना लकड़ी का बक्सा था। बक्सा इतना पुराना था कि उसका ताला जंग खा चुका था।

कमलेश ने बक्सा खोला। अंदर कुछ पुराने कागज थे, कुछ तस्वीरें, और एक छोटा सा लॉकेट। तस्वीरों में कुछ लोग थे, जो पुराने ज़माने के कपड़े पहने थे। एक तस्वीर में एक औरत थी, जिसके चेहरे पर दर्द का भाव था। लॉकेट में भी वही चेहरा था। कमलेश को लगा कि शायद ये कोई पुरानी कहानी है, जो उसकी स्टोरी को और रोचक बना सकती है। उसने लॉकेट और तस्वीरें अपने बैग में डाल लीं और वापस लौटने लगा।

लेकिन जैसे ही वह सीढ़ियों पर चढ़ने लगा, उसे लगा कि कोई पीछे से उसका नाम पुकार रहा है। “कमलेश...” आवाज धीमी थी, जैसे कोई फुसफुसा रहा हो। उसने पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। उसका दिल फिर से तेज़ धड़कने लगा। उसने कदम तेज़ किए और खदान से बाहर निकल आया।

वापस गेस्ट हाउस पहुँचते-पहुँचते शाम हो चुकी थी। उसने रामलाल को तस्वीरें और लॉकेट दिखाया। रामलाल का चेहरा पीला पड़ गया। “ये कहाँ से लाया?” उसने काँपती आवाज में पूछा।

“खदान से,” कमलेश ने कहा। “क्या हुआ? कुछ जानते हो इनके बारे में?”

रामलाल ने गहरी सांस ली और कहा, “ये लॉकेट उस औरत का है, जिसे सौ साल पहले खदान में मार दिया गया था। लोग कहते हैं, उसकी आत्मा आज भी वहाँ भटकती है।”

कमलेश को ये बात हास्यास्पद लगी, लेकिन रामलाल की आँखों में डर साफ दिख रहा था। उसने लॉकेट को अपने पास रख लिया और कमरे में चला गया। उस रात उसे फिर से वही दस्तक सुनाई दी। टक... टक... टक। लेकिन इस बार वह खिड़की नहीं खोलने वाला था। उसने लॉकेट को मेज पर रखा और लाइट जलाकर सोने की कोशिश की।

लेकिन आधी रात को उसकी आँख खुल गई। कमरे में ठंड थी, इतनी कि उसकी सांस दिख रही थी। उसने देखा कि लॉकेट मेज पर नहीं था। वह बिस्तर से उठा और उसे ढूंढने लगा। तभी उसे बाथरूम से पानी की आवाज आई, जैसे कोई नल खुला हो। वह बाथरूम की ओर गया। नल बंद था, लेकिन दर्पण पर कुछ लिखा था: “वापस लौटा दे।”

कमलेश का शरीर ठंडा पड़ गया। उसने पूरे कमरे में लॉकेट ढूंढा, लेकिन वह कहीं नहीं था। तभी उसे खिड़की के पास कुछ हलचल दिखी। उसने टॉर्च जलाई और देखा कि कोहरे के बीच वही आकृति थी, जो उसने पहली रात देखी थी। इस बार वह साफ थी—एक औरत, जिसके कपड़े फटे हुए थे, और चेहरा वैसा ही था जैसा लॉकेट की तस्वीर में।

“वापस... लौटा... दे...” उसकी आवाज हवा में गूंज रही थी। कमलेश के हाथ-पैर काँपने लगे। उसने दरवाजा खोलकर भागने की कोशिश की, लेकिन दरवाजा नहीं खुल रहा था। उसने पूरी ताकत लगाई, लेकिन दरवाजा जैसे जाम हो गया था।

तभी कमरे की लाइट झपकने लगी। हर झपक के साथ वह आकृति करीब आ रही थी। कमलेश चिल्लाया, लेकिन उसकी आवाज कमरे की दीवारों में ही गूंजकर रह गई। आकृति अब ठीक उसके सामने थी। उसका चेहरा इतना पास था कि कमलेश उसकी सड़ी हुई सांस की गंध महसूस कर सकता था।

“वापस... लौटा... दे...” उसने फिर कहा, और उसका ठंडा हाथ कमलेश के कंधे पर रखा गया।

सुबह जब रामलाल कमलेश के कमरे में गया, तो वह खाली था। बिस्तर पर सिर्फ वही लॉकेट पड़ा था, जो कमलेश ने खदान से लाया था। कमलेश का बैग, उसका लैपटॉप, सब गायब था। रामलाल ने पुलिस को बुलाया, लेकिन खोजबीन में कुछ नहीं मिला। गाँव वालों ने कहा कि खदान की आत्मा ने उसे ले लिया।

आज भी कालापानी में रात का सन्नाटा वैसा ही है। लोग कहते हैं कि अगर आप खदान के पास रात को जाएँ, तो आपको दस्तक सुनाई देगी। टक... टक... टक। और अगर आपने कुछ लिया जो उसका है, तो वह वापस माँगने आएगी।


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